मध्य प्रदेश

Singrauli News : भाजपा गढ़ में कांग्रेस ने मारी बाजी, विजय ने फहरायी विजयी पताका

साढ़े 23 साल बाद कांग्रेस के वार्ड प्रत्याशी को मिली एकतरफा जीत, 173 मतों से बीजेपी प्रत्याशी को दी शिकस्त

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सिंगरौली । नगर पालिक निगम सिंगरौली के वार्ड क्रमांक 34 का पार्षद उपचुनाव भाजपा के लिए सिर्फ एक सीट की हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक अहंकार, गलत निर्णय और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की खुली पराजय बनकर सामने आया है।

कांग्रेस प्रत्याशी विजय शाह ने भाजपा प्रत्याशी अशोक सिंह को 173 मतों के बड़े अंतर से हराकर न केवल जीत दर्ज की, बल्कि भाजपा के अजेय होने के दावे को भी धराशायी कर दिया। चुनाव परिणाम घोषित होते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विजय जुलूस निकालकर जश्न मनाया, जबकि भाजपा खेमे में निराशा, खामोशी और अंदरूनी बेचैनी साफ दिखाई दी। वहीं भाजपा की ओर से जिला अध्यक्ष सहित कई बड़े नेता घर-घर प्रचार करते नजर आए, लेकिन यह प्रचार वोट में तब्दील नहीं हो सका। मतदाताओं का कहना है कि प्रचार में जनहित कम और सत्ता का दंभ ज्यादा नजर आया। जनता ने साफ कर दिया कि सिर्फ नेताओं की मौजूदगी से वोट नहीं मिलते। इधर सूत्रों के अनुसार भाजपा प्रत्याशी में भी अहंकार की झलक साफ दिखाई दे रही थी। यह मान लिया गया था कि पार्टी का नाम और सत्ता का प्रभाव ही जीत दिला देगा। स्थानीय कार्यकर्ताओं से दूरी, मतदाताओं से सीमित संवाद और जीत तय है वाली मानसिकता ने नुकसान पहुंचाया। इसके उलट कांग्रेस प्रत्याशी विजय शाह ने शांत, मुद्दा-आधारित और जनसंवाद केंद्रित प्रचार किया। साथ ही विजय शांत स्वभाव के अलावा पठन-पाठन सरस्वती विद्यालय विंध्यनगर में हुआ था। जहां यहां के शिक्षको से उनका गहरा नाता है। यही कारण रहा कि 6 बूथों पर कांग्रेस निर्णायक बढ़त बनाने में सफल रही।

आंकड़ों के मुताबिक भाजपा पार्षद प्रत्याशी अशोक सिंह को मात्र 244 मत मिले। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी विजय शाह को 417 मत हासिल हुआ। बसपा प्रत्याशी को 49 मत ही मिले। जीत के बाद कांग्रेस के पार्षद विजय ने इसका श्रेय वार्ड के सभी मतदाताओं को दिया। हालांकि उसने अपने आभार में कांग्रेसी पदाधिकारियों का नाम नही लिया।

आरएसएस की अनदेखी, भाजपा को भारी

इस चुनाव में भाजपा को जो सबसे गहरा झटका लगा, वह आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं की नाराजगी के रूप में सामने आया। सूत्र बताते हैं कि टिकट वितरण से संघ के कई स्वयंसेवक असंतुष्ट थे। उनकी सलाह और फीडबैक को नजरअंदाज किया गया, जिसका असर यह हुआ कि संघ से जुड़े कई कार्यकर्ता न प्रचार में सक्रिय दिखे और न ही मतदान के दिन जोश के साथ नजर आए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि संघ की यह मौन असहमति भाजपा के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। यह चुनाव भाजपा-संघ समन्वय पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है और अब हार का ठिकरा किसके सिर पर फुटेगा, यह तो जब भाजपा आत्ममंथन एवं सही मायने में हार के कारणों का पता करेगी। हालांकि भाजपा की हार का कारण चर्चाओं में है और कहीं न कहीं भाजपा संगठन ने आरएसएस को नजरअंदाज किया।

7 बूथ का सचः बीजेपी को 1 में बढ़त

इस उपचुनाव का सबसे बड़ा और चौकाने वाला पहलू बूथ-वाइज परिणाम रहे। वार्ड में कुल 7 मतदान केंद्र थे, जिनमें से भाजपा को सिर्फ एक बूथ पर मामूली बढ़त मिली, जबकि शेष 6 मतदान केंद्रों पर कांग्रेस ने भाजपा को भारी मतों के अंतर से पछाड़ दिया। यह आंकड़ा खुद में भाजपा के संगठनात्मक दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। जिन इलाकों को भाजपा अपना मजबूत गढ़ मान रही थी, वहीं मतदाताओं ने पार्टी को सिरे से नकार दिया। यह साफ संकेत है कि यह हार किसी एक कारण से नहीं, बल्कि संगठन, प्रत्याशी चयन, बूथ प्रबंधन और नेतृत्व, सबकी सामूहिक विफलता का परिणाम है।

टिकट वितरण में वन मैन शो, मनमानी भारी पडी

भाजपा की इस हार की पटकथा टिकट वितरण के वक्त ही लिख दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक, वार्ड 34 में टिकट वितरण संगठनात्मक सहमति या जमीनी फीडबैक के आधार पर नहीं, बल्कि जिला अध्यक्ष की कथित मनमानी से किया गया। कई स्थानीय कार्यकर्ताओं ने पहले ही आगाह किया था कि गलत प्रत्याशी चयन पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी ने नए, साफ छवि और जनस्वीकार्य चेहरे को मौका देने के बजाय फिर उसी पुराने चेहरे पर भरोसा जताया, जिससे जनता पहले ही दूरी बना चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि कार्यकर्ताओं का उत्साह टूट गया। गया और उसका सीधा असर मतदान पर दिखा

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